शौर्य नमन – बलिदान दिवस –
हवलदार (गनर) सरतूल सिंह
यूनिट – 153 मीडियम रेजिमेंट
बटालिक सब सेक्टर का संग्राम
ऑपरेशन विजय
कारगिल युद्ध 1999
हवलदार (गनर) सरतूल सिंह जम्मू-कश्मीर के कठुआ जिले के महानपुर के माड़ा पट्टी कैलड़ी के निवासी थे। 30 मई 1980 को वह भारतीय सेना की आर्टिलरी रेजिमेंट में रंगरूट के रूप में भर्ती हुए थे और 30 अप्रैल 85 को उन्हें 153 मीडियम रेजिमेंट मे स्थानांतरित किया गया था। अपनी बटालियन में भिन्न-भिन्न परिचालन परिस्थितियों और स्थानों पर सेवाएं देते हुए वर्ष 1999 तक वह हवलदार के पद पर पदोन्नत हो गए थे।
वर्ष 1999 में सरतूल सिंह की नियुक्ति पंजाब के फिरोजपुर छावनी में थी। जून महीने के आरंभ में वह अवकाश पर घर आए हुए थे। उन्हें अवकाश व्यतीत करते कुछ दिन ही हुए थे कि कारगिल में व्यापक क्षेत्र में पाकिस्तानी घुसपैठ उजागर होने पर उनकी यूनिट को कारगिल युद्ध क्षेत्र में पहुंचने का आदेश दिया गया। वह बोफोर्स तोप टुकड़ी में थे।
“ऑपरेशन विजय” में 12 जुलाई 1999 की, रात्रि में आकस्मिक लंबवत चढ़ाई के, संकरे और संकटमय मार्ग से तोपों को ले जाने की आवश्यकता हुई। युद्ध की स्थिति में, इस क्षेत्र में तोपों के साथ चलना संकटमय और चुनौतीपूर्ण था। सामरिक महत्व की ऊंचाईयों से घुसपैठियों ने कारगिल-श्रीनगर हाईवे पर सेना के वाहनों पर गोलाबारी आरंभ कर दी। हवलदार सरतूल सिंह की CONVOY द्रास सेक्टर के एक स्थान से निकल रही थी, उसी समय शत्रु द्वारा हाईवे को सीधा निशाना बनाया कर गोलाबारी की गई और उनकी बोफोर्स तोप गहरे गड्ढे में लुढ़क गई।
अपनी जीवन सुरक्षा की घोर उपेक्षा करते हुए वह तोप को ऊपर खींचने का भरसक प्रयास करते रहे। अंततः तोप के साथ गहरी खाई में सरक गए और वीरगति को प्राप्त हुए।
हवलदार सरतूल सिंह ने असाधारण, साहस और वीरता का उदाहरण प्रस्तुत करते हुए वीरतापूर्ण मृत्यु का वरण किया और अपने साथियों के लिए एक उच्च स्तरीय उदाहरण प्रस्तुत किया।
हवलदार सरतूल सिंह के बलिदान को भारत में युगों-युगों तक स्मरण किया जाएगा। 


जय हिंद!! जय जवान!!
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टीम शौर्य गाथा शौर्य नमन
